Monday, May 15, 2017

फिर बज उठे हवा के नूपुर

फिर बज उठे हवा के नूपुर
फूलों के, भौंरों के चर्चे
खुले आम आँगन-गलियारे
बँटने लगे धूल के पर्चे

जाने क्या कह दिया दरद ने
रह-रह लगे बाँस वन बजने
पीले पड़े फसल के चेहरे
वृक्ष धरा पर लगे उतरने
पुरवा लगी तोड़ने तन को
धारहीन पछुआ के बरछे

बैर भाँजने हमसे, तुमसे
मन हारेगा फिर मौसम से
निपटे नहीं हिसाब पुराने
तन, रस, रूप, अधर, संयम से
फूलों से बच भी जाएं तो
गंधों के तेवर हैं तिरछे।

-विनोद निगम

No comments: